क्यों
छुप के देखते हैं,
लोग
आज कल,
दास्तान अपनी... क्यों?
खो देने पर तुले हैं
पहचान अपनी...।
चलो माना
उनके पास है
वक्त की
बहुत ज्यादा कमी,
पर
कभी देखी ही नहीं
हाव-भाव में,
आँखों में
इस बात का अफसोस
या नमी ।
आज के इस
मायूसी भरे माहौल में
हर रिश्ता
दम तोड़ने पर तुला है,
हर रिश्ते को चाहिए
बस थोड़ा सा
अपनों का समय।
अब
कौन याद दिलाये?
किए हुए वादे,
दिखाए हुए सपने,
बहुत करीबी होते हैं
अपनों से भी
ज्यादा अपने होते हैं।
फिर क्यों ?
तोड़ दिए जाते हैं,
अपनों के हाथों
अपनों के ही सपने
क्यों ?
खून के आंसू रुलाते हैं।
पल में सगे
और
पल में दुश्मन बन जाते हैं,
प्यार से प्यारे
रिश्ते को भी
लोग
निभा नहीं पाते हैं।
@ज्योति सिन्हा
मुजफ्फरपुर, बिहार