*********
गाड़ी धरे गइलें भुअर लोग के लउकल मेला,
काँपल करेज भीड़ देख आ ओजवा के खेला।
पनरे गो से बेसी मोटरी रखले रहस मगरूँ,
कूलर संगे तीन गो पंखा टंगले रहस झगरू।
गोलू भोलू पहिया वाला रहस धउरावत पेटी,
डब्बा खोजे में शिवलोचन के भूला गइली बेटी।
लोग रहे धउरत अइसे कि आइल होखे लहर,
आत्रा मात्रा सब भूलइलें संगे भूलाइल बहर।
रहे आरक्षित अनारक्षित के एके जइसन हाल,
बाल्टी का पेनी से छिलाइल गणपति के गाल।
कुकर के झोरा गोली बिगली, जान के सीट पर,
बाप बाप चिल्लइलें दीना चोट लागल पीठ पर।
चढ़े में लागल रहस सोनू चोर ले गइल मोबाइल,
चेन खुल गइल चनेसर के साबुन सरफ छीटाइल।
सोंचले भुअर एह दशा में कइसे करब जतरा,
जेने देखीं ओनहीं एजा त लउकत बाटे खतरा।
दृश्य देख लागल कि बरपी जतरा में बहुते कहर,
आत्रा मात्रा सब भूलइलें संगे भूलाइल बहर।
शीत ताप नियंत्रित डिब्बा के रहे टिकस कटाइल,
भीड़ भाड़ रहे ना बेसी आराम से सीट भेंटाइल।
ट्रेन का खुलते पसरे लगलें यात्री ओढ़ के चदर,
आ कुछे देर में मच्छरन के दल करे लागल उपदर।
हाँकत बेलावत थपरी बजावत बीतल आधा रात,
ले गइल ले गइल बाकस ले गइल रहे केहू चिल्लात।
भोरे उठ जब नीचा देखलें पीटलें बेचारू छाती,
जूता बैग कुछहु ना रहे उड़इलस चोर सब थाती।
चल दिहले हाथ दुमावत धइले गाँव के डहर,
कान ध के किरिया खइलें फेरू ना जाइब शहर।
दिलीप पैनाली