Friday, May 29, 2020

दूसरा गठबंधन



सीताराम जी रोज शाम को मंदिर जाते थे। उनको वही सुकून मिलता था। भगवान के सामने बैठकर अपना दुःख बाँट लेते थे उनका मन हल्का हो जाता था। वे तकरीबन5 बजे मंदिर जाते थे और देर तक मंदिर के नीचे वाली सीढ़ी पर बैठा करते थे। एक दिन वे सिसक - सिसक कर रो रहे थे तभी अचानक एक औरत की नजर उनपर पड़ी और वह उनसे उनके रोने का कारण पूछने लगी। एक अजनबी द्वारा चुप कराए जाने पर सीताराम को बहुत शर्म महसूस हुआ लेकिन वह अपने आप को रोक नहीं पा रहे थे और अचानक कब रोने लगे उनको भी पता न चला। उस औरत के चुप कराए जाने पर वह चुप हो गए लेकीन 
जब वह वजह पूछी तो उनके मुख से कोई शब्द न निकल पाया। रात होने लगी थी। औरत अपने घर जाना चाहती थी। कुछ सोचे समझे अपना नाम बोरनाली बरुआ बताया तथा उनका नाम भी पूछ लिया।
आपका नाम बोताओ, क्या नाम है आपका?
ह ह हमरा नाम ह सीताराम है न ।
बोरनाली  तो ठीक है हम चोलते है, फिर कभी मिलेंगे।
सीताराम ह ह ठीक है(अपने आंखों को पोछते हुए।)
तुमरा बहुत बहुत धन्यवाद जो हमको चुप कराई।
दोनों चले गए।
घर जाकर बोरनाली सीताराम के बारे में सोचती रही । आखिर क्या बात होगी जो एक बुजुर्ग व्यक्ति इस तरह  फफक- फफक कर रो रहा था। जब वह बिस्तर पर सोने के लिए गई तब भी वह सीताराम के बारे में ही सोच सोच कर सोई। 
सीताराम भी बोरनाली के बारे में ही सोच रहे थे गजब की औरत है आखिर मुझे चुप करा दिया, उसको दिल से धन्यवाद। आखिर घर में मुझे समझता ही कौन है! बहुत दिनों बाद कोई अपने जैसा लगा। सीताराम को बहुत हल्का लग रहा था।
सीताराम की उम्र 69 वर्ष है। हार्ट अटैक हो जाने के कारण उनकी पत्नी उर्मिला देवी स्वर्ग सिधार गई। उनके तीन बेटे और एक बेटी है। तीनों बेटों की शादी हो चुकी है घर में तीन बहुएं है फिर भी उनको न तो समय पर खाना मिलता न ही उनका पसंद ना पसंद का कोई ख्याल रखने वाला है। ह उनकी बेटी दिनभर में एक बार फोन करके अवश्य अपने पिता का खबर लेती है ।  घर में बहुत सारे बच्चे है लेकिन बच्चों को तो और भी समय नहीं। सुबह सात बजे के पहले ही स्कूल चले जाते और शाम को आकर ट्यूशन फिर होमवर्क करके थक जाते। 
सीताराम जी पत्नी के जाने के बाद बेहद अकेलापन महसूस करने लगे।  उनसे कोई सीधे मुंह बात नहीं करता। हालांकि धन - संपदा की कोई कमी नहीं घर में। उनका मन बहुत बैचन रहता था। इलाके के रईसों में उनका नाम था। उनके पास सब कुछ था परंतु उनका जीवन रंगहीन हो चुका था।
दूसरे दिन भी वे मंदिर के अंतिम सीढ़ी 
पर जाकर बैठे और कहीं न कहीं उस अनजान बोरनाली का राह देखा कि शायद वह आए लेकिन वह आईं नहीं । बहुत देर तक इंतज़ार करने के बाद जब रात होने लगी तो घर वापस आये । वे सोच रहे थे काश कि बोरनाली का फोन नम्बर लिया होता। 
सीताराम जी हर रोज ही मंदिर जाते तथा उनकी आंखें बोरनाली को ढूंढती थीं लेकिन हप्तों तक वह दिखी नहीं।

महिलाओं में एक अच्छाई होती है कि वह अपना दर्द किसी न किसी से कह देती है लेकिन पुरूष बेचारों को शायद भगवान ने इस कला से नवाजा ही नहीं कि वे अपना दर्द आसानी से किसी को बयां कर सकें । 
सीताराम जी शंकर भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। शिवरात्रि के दिन बहुत तैयारी के साथ मंदिर गए। पूजा समाप्त होने के बाद जब वह सीढियों से उतर रहे थे तब तक बोरनाली के साथ उनकी आँखें चार हो गई। वह भी बड़ी सज-धज कर आई थी, भोले बाबा के मंदिर में शिवरात्रि के दिन।  वह कुछ कहने वाली थी तब तक सीताराम ने कहा पहले आप पूजा कर लो फिर आराम से बात करेंगे। 
बोरनाली पूजा करते समय भी सीताराम की बातें ही सोच रही थी। मंदिर के पुजारी बजररंग बाबा बोरनाली और सीताराम दोनों को ही बहुत अच्छे से पहचानते थे। 
बजररंग बाबा बोरनाली के हाथ में अक्षत फूल दे दिए और मंत्र पढ़ने लगे। इधर बोरनाली मुट्ठी में बंद करके गहन चिंतन में खो गई। पुजारी जी के कई बार आवाज लगाने पर वह होश में आई। पूजा समाप्त हुई। वह बेहद उत्साहित थी सीताराम जी के दर्द को जानने हेतु। लेकिन शिवरात्रि का दिन होने की वजह से मंदिर के प्रांगण में बहुत भीड़ थी । दोनों चाहकर भी अच्छे से बात नहीं कर पाए। हाय हेलो तक ही बात हुई।  पर बोरनाली ने उस दिन सीताराम जी का फोन नम्बर ले लिया। उस दिन बोरनाली को बहुत अच्छा लग रहा था।
वह घर जाकर अपने सारे काम निपटा 
कर आराम से सीताराम जी को फोन लगती है। उधर सीताराम जी भी उसके फोन का बेसबरी  से प्रतीक्षा कर रहे थे।
शाम के तकरीबन 5 बजे । सीताराम के फोन की घँटी बजती है।
9957654478 calling
वे दिल थाम कर फोन रिसीव करते है।
हेलो .........
हम बोरनाली बरुआ.......
अच्छा ..........
थोड़ा रुको हम आपको फोन मिलते है। घर से निकल कर सड़क के तरफ फोन को मजबूती से पकड़े हुए । लगभग आधा किलोमीटर जाने के बाद वे फोन लगते है। 
हेलो .....
जी, कहिए घर में आपसे अच्छे से बतिया नहीं पाते इसीलिए घर से दूर निकल आए है ताकि अच्छे से बात कर सके।
बोरनाली......अ अ ठीक समझी ।
सीताराम जी।  कुछ बताओ अपने बारे में
हम सरकारी स्कूल में मास्टरनी है। घर में अब कोई नहीं है। माँ देउता मर गया और उनका हमही एक ठु बच्चा है। हम अकेले घर में रहती है। कोई और नहीं। 
ओह.........
कोई नहीं अब अकेली नहीं रही हम है। सीताराम ने बोल डाला।
कुछ देर तक दोनों निःशब्द रहे। 
फिर दोनों ने साथ में कहा ह ह......
ये ठीक है।
अब तो हर दिन ही बोरनाली संध्या 5 बजे फोन करती थी। क्योंकि दिनभर विद्यालय में व्यस्त रहती। 
सीताराम को अपनी वीरान सी ज़िंदगी 
अब रंगीन लगने लगी थी। कई दिनों से सोने के पहले भी इनकी बातें होने लगी थी। 
घर में बहुत सारे लोग होने की वजह से सीताराम जी ने व्हाट्सएप में बात करना ही मुनासिब समझा और रात को सोने के समय देर रात तक ऑनलाईन रहकर बोरनाली से अपना दुख- सुख बांटते। 
बोरनाली को भी बहुत अच्छा लगता कि उसका भी दुःखद बांटने वाला कोई मिल चुका है।
चाहे मनुष्य किसी भी उम्र का हो उसे प्रेम की आवश्यकता जिंदगी के हर पड़ाव पर होती है। बोरनाली और सीताराम अब एक दूसरे के पूरक बन चुके थे। पिछली जिंदगी को भुलाकर एक नई शुरुआत करना दोनों की विवशता बन चुकी थी। अब मंदिर प्रांगण में दोनों का मिलना जुलना होने लगा। मंदिर के पुजारी बजरंग बाबा इस घटना से अछूते न रहे। बोरनाली और सीताराम दोनों ने एक सूत्र में बंधने की सबसे पहली सूचना बजररंग बाबा को बताई। 
पहले तो बजरंग बाबा हाय ! राम हाय! राम की दुहाई देते रहे । घोर कलयुग का हवाला देते रहे लेकिन जल्द ही,वे राजी हो गए। उनको बहुत अच्छे से पता था कि जीवनसंगिनी के बिना   जीवन कितना नीरस  होता है। सातों रंगों के बीच से जैसे लाल रंग ही गायब हो। 
बहुत जल्द बजरंग जी बोरनाली और सीताराम की शादी के लिए तैयार हो गए। समाज के लोगों ने बहुत तरह की बाते बनाई। कुछ ने तो यहाँ तक कहाँ कि इन दोनों का अफेयर वर्षों पुराना है लेकिन  दोनों ने अफवाहों को दरकिनार करते हुए एकसूत्र में बंधने का निर्णय कर लिया। उनके बेटों को भी इसकी भनक लग गई। पर सभी ने इसकी मौन सहमती दे ही दी। 
सीताराम जी पैसे रुपये से सम्पन्न थे। उन्होंने जल्द ही एक नया मकान बना लिया। 
शिवरात्रि के दिन ही गाजे बाजे के साथ हर रश्म को पूरा करते हुए एक बार और दूल्हा बने। बजररंग जी बोरनाली के पिता बने।  वहाँ पधारे हुए लोगों ने जल्द ही बाबा बजरंग जी को भी शादी के बंधन में बंधने हेतु आशीर्वाद दिया। बाबा फुले न समाए।
बोरनाली भी दुल्हन के रूप में खूब शर्मा रही थी उसके जीवन के ये सबसे  
सुखद पल थे।

*अर्चना पांडेय अर्चि*
*तिनसुकिया, असम*

Friday, May 22, 2020

मनुष्य और कविता


अगर आप
हर रोज की परेशानियों से
खूब परेशान हो रहे है
आपकी परेशानियां चाहे कैसी भी हो
घर की
बाहर की
ऑफिस की
रिश्तेदारों की
बच्चों की
पत्नी की
पड़ोसी की
महंगाई की
बदलते मौसम की
ढलते उम्र की
हर समस्याओं का एक ही समाधान है
कि आप आप कवि बन जाएं
और अपनी भावनाओं को
कलम के माध्यम से व्यक्त करे।
जयहिंद

अर्चि

Saturday, May 16, 2020

देश हम सबका है

सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है अगर आपके नजदीक वाली सड़क से कोई भी व्यक्ति अपने घर जाने के लिए  पैदल सफर कर रहा है तो उसको खाने की वस्तु अवश्य दें । कैसी विडंबना है हमारे भारतवर्ष में कुछ लोग भरपेट खाकर बिस्तर में भला कैसे सो सकते है जब भारतमाता का ही दूसरा बच्चा खाली पेट सड़क पर चल रहा हो। हिंदुस्तान इतना अमीर होने के बावजूद भी भूखा है यह बात हजम नहीं होती ।  कृपया आप सभी आगे आएं आपने देश के निर्माताओं की सहायता करें। जिन्होंने सड़के बनाई है, ऊंचे भवन बनाएं है, अस्पताल, मंदिर और भारत के सांसद तक बनाएं है। उनको पेटभर खाने का अधिकार है। भला अपने ही देश में भारतवासी फंसे कैसे हो सकते है। आप सोचिए, चिंतन कीजिए। इस संदेश को अन्य लोगों तक पहुचाएं ताकि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की मदद करके सही मायने में मनुष्य का धर्म निभा सके ।  भारत भूमि  आज भी सोने की चिड़िया है, सम्पन्न है खुशहाल है। बस समझदारी की आवश्यकता है।

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अर्चि

Friday, May 15, 2020

दिल तो बच्चा



राधा देवी की ज़िंदगी बहुत ही खुशहाल थी। उनकी पसंद की लगभग प्रत्येक वस्तु उनके पास विराजमान थी। यू तो उनकी शादी आठ 
वर्ष की उम्र में हुई थी क्योंकि उनकी बड़ी बहन की शादी हो रही थी तो साथ में उनकी भी कर दी गई। लेकिन   राधा देवी के जीवन  में कभी कोई चीज की कमी नहीं हुई। छोटी उम्र में शादी होने की वजह से ससुराल में बहुत सारा प्यार मिला । उनकी बड़ी दीदी वसुंधरा देवी भी अपनी छोटी बहन का खास ख्याल रखती थी। वसुंधरा देवी के पति नाते में राधा देवी के जीजा जी होते थे लेकिन भसुर वाला रिश्ता ही हमेशा कायम रहा। कभी कभार हँसी मजाक हो जाया करती थी वो अलग बात थी । 
साठ की उम्र बीत जाने के बाद भी राधा देवी के जीवन में खुशियां ही खुशियाँ थी। उनके सारे बच्चे सेटल हो चुके थे। उनकी छोटी बहू विभा उनकी खुशयों की श्रोत थी। राधा देवी ने हमेशा विभा को अपनी बेटी से बढ़कर माना तथा विभा ने भी उनका मान रखा वो भी अच्छे खानदान से थी और राधा देवी को अपनी माँ से बढ़कर मानती थी। एक रात की बात है तकरीबन 2 बजे रात को राधा देवी के पति वासुदेव जी जोर जोर से आवाज लगाने लगे
अरे वो चिंटू की मइया, सुनती हो
हमार छाती में बहते दर्द है, हम से बर्दाश्त नहीं होत है
चिंटू को बुलाओ, डॉक्टर साहब के पास अबही ले चलो
अइसन लगता है कि जान निकल जाई
चिंटू का हुआ बाबू जी
बाबूजी तब तक बेहोश हो गए
विभा पानी गर्म कर के लाई, बाबूजी गर्म पानी पी लीजिए आराम हो जाएगा।
बाहर में अंधी तूफान जोर पर था ऊपर से रात के 2 बज रहे थे। 
चिंटू फोन उठाकर डॉक्टर को फोन लगता है
डॉक्टर अंसारी , आवाज आता है  जिस नम्बर को आप फोन लगा रहे है वो पहुंच के बाहर है।
The number u r dailing is not reachable, dial after sometime.
राधा देवी  पैर में जोर जोर से तेल मालिस करने लगी
घर में अफरा तफरी मच गया। जब तक डॉक्टर पहुँचा, सुबह हो गई।
घर में आस पास के लोग जमा हो गए।
वासुदेव बाबू स्वर्ग सिधार चुके थे। घर में मातम का माहौल छा गया । जितनी मुंह उतनी बातें 
कई लोग कहते अगर समय पर डॉक्टर बाबू आ जाते तो वासुदेव भैया 
अवश्य बच जाते । पैसठ वर्ष के ही तो थे, ये भी कोई उम्र है जाने की।
वासुदेव जी बड़े खुशमिजाज किस्म के थे आस पास के गांव के लोग से उनकी खूब बनती थी। सभी लोग उनकी मौत से दुःखी थे। 
राधा देवी शौकीन मिजाज की थी। लाल रंग से उनको बहुत प्यार था। पति के मौत के बाद किसी को हिम्मत नही  हो रही थी कोई उनके पास सफेद साड़ी लेकर जाए। यह काम उनकी छोटी ननद शोभा को दिया गया, जिसको राधा अपनी बेटी जैसा प्यार करती थी। 
शोभा डरते डरते गई सफेद कपड़े लेकर
भौजी ई ल 
आज से ई हे
राधा का.......
ई सफेद साड़ी हमरा के
ना हमारा से ना होई
सफेद साड़ी राधा उठा कर फेंक देती है।
किसी की हिम्मत नहीं होती कि उनको जा कर बोले कि सफेद साड़ी पहने।
राधा चिल्ला- चिल्ला कर कह रही थी
हमार पति के मौत हुई है
हमार मन के ना 
हम विधवा हुए है, हमार मन आज भी 
सुंदर चीज को पसंद करत है।
हम से सफेद कपडा धारण ना होई।
ई समाज आपन रस्म हमारा पर मत थोपो, हम विधवा भइनी, हमार मन ना। 
ये सब सुनकर सभी की छाती फट जाती हाय रे समाज, हाय रे रीति रिवाज।
सभी की आंखे छलक जाती। खुले दिल वाली राधा आगे कहती
जब दो लोग एक साथ जन्म नहीं लेते
तो एक साथ मरेंगे कैसे?
राधा के जहन में तमाम सवाल थे जो समाज के मुंह पर चाटा थे। जिनका उत्तर किसी के पास नहीं था। 
बाद में पुरोहित जी के बहुत मनाने पर वह सफेद कपड़े पहनी लेकिन संतुष्ट नहीं थी।
समय का काम है चलते जाना कभी रुकता नहीं है। पांच वर्ष के बाद राधा देवी की पोती मुस्कान की शादी ठीक हुई जो पेशे से इंजीनियर थी और उसका होने वाला पति भी इंजीनियर था। घर में खूब शॉपिंग हो रही थी। किसी दिन गहने की तो किसी दिन कपड़े की। सभी के लिए कपड़े खरीदें 
गए । राधा देवी के लिए भी सूती की हल्के रंग की साड़ी जो उनको बिल्कुल न भाई। लेकिन उतने सारे लोगों में कुछ कह न पाई। 
चपल जो उनके लिए खरीदें गए थे वो फूटे आंख न सुहाए। बेचारी मन को कितना संभाले बाकी लोगों के रंग विरंगे कपड़े गहने देखकर राधा का मन विचलित हो रहा था। 
शादी के दिन तो गजब हो गया ।  सभी के लाल पीले चमकीले लिबास में देखकर राधा ने भी अपनी एक पहले वाली लाल साड़ी पहन ली लेकिन वह साड़ी बहुत पुरानी होने की वजह से राधा के मन को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। शाम हो होने लगी देखते ही देखते सारे हित रिश्तेदार पहुंच गए । राधा के भाई और भतीजे तथा साथ में भाभी भी आई। 
अपनी माता तुल्य भाभी को देखकर राधा अपना दुःख बर्दास्त न कर पाई। अपनी भाभी के गले लग कर जोर जोर से रोने लगी।
सिसक -सिसक कर कह रही थी
भउजी हो हमरा के दोसर, चमकीला, साड़ी किन द
हम ई न पहनब, भइया से किनवा द।
उनके भैया महेश जी उसी समय चटक लाल रंग की साड़ी खरीद कर ले आए और राधा पहन कर शादी का लुत्फ़ उठाई, उसका मन हल्का हो चुका था।

अर्चि

मेरे दोस्त



हाँ, जब मैं अकेली होती
अकेली बिल्कुल भी नहीं होती
मेरे साथ होते हैं मेरे बहुत सारे मित्र
जो पल-पल मेरे जीवन में फैलाते इत्र
उम्मीदों का दामन थामे हुए
मेरी सबसे अच्छी दोस्त है 
मेरी प्यारी कलम
हर वक्त राह दिखाने वाली
एक नया रास्ता सृजन करने वाली

मेरा और एक मित्र है
सूरज दादा
जो साथ ही चलता है सदा
जहाँ मैं जाऊं, संग चलता
जिंदगी में रोशनी भरता

एक और बेहद खास दोस्त है चाँद
जिससे मैं 
घँटों बाते करती हूँ
आसमान में चंद्रमा
और धरती पर मैं
फिर भी चंद्रमा
मेरी हर बात
बड़े ध्यान से सुनता है
गजल, गीत,कविता और ना जाने
क्या -क्या
हर सुख और दुःख में शामिल है चाँद
बहुत अच्छा लगता है
चाँद आसमान से मुझे देखता
और जमीन पर बैठकर मैं
अपनी हाले दिल
चाँद को सुनाती हूँ
वह बहुत ध्यान से सुनता है
मेरे सुख-दुःख का सहभागी बनता है
कहता है अर्चि
मैं तुम्हारा सबसे अच्छा मित्र हूँ
बिल्कुल चंदन जैसा शुद्ध,शीतल।

108 घण्टे चली देवी की आराधना

*हिंद देश परिवार का 108 घंटे देवी दुर्गा को समर्पित वर्चुअल कार्यक्रम* *देश विदेश के रचनाकारों ने देवी मां के साथ घर की मां की पूजा का किया ...