राधा देवी की ज़िंदगी बहुत ही खुशहाल थी। उनकी पसंद की लगभग प्रत्येक वस्तु उनके पास विराजमान थी। यू तो उनकी शादी आठ
वर्ष की उम्र में हुई थी क्योंकि उनकी बड़ी बहन की शादी हो रही थी तो साथ में उनकी भी कर दी गई। लेकिन राधा देवी के जीवन में कभी कोई चीज की कमी नहीं हुई। छोटी उम्र में शादी होने की वजह से ससुराल में बहुत सारा प्यार मिला । उनकी बड़ी दीदी वसुंधरा देवी भी अपनी छोटी बहन का खास ख्याल रखती थी। वसुंधरा देवी के पति नाते में राधा देवी के जीजा जी होते थे लेकिन भसुर वाला रिश्ता ही हमेशा कायम रहा। कभी कभार हँसी मजाक हो जाया करती थी वो अलग बात थी ।
साठ की उम्र बीत जाने के बाद भी राधा देवी के जीवन में खुशियां ही खुशियाँ थी। उनके सारे बच्चे सेटल हो चुके थे। उनकी छोटी बहू विभा उनकी खुशयों की श्रोत थी। राधा देवी ने हमेशा विभा को अपनी बेटी से बढ़कर माना तथा विभा ने भी उनका मान रखा वो भी अच्छे खानदान से थी और राधा देवी को अपनी माँ से बढ़कर मानती थी। एक रात की बात है तकरीबन 2 बजे रात को राधा देवी के पति वासुदेव जी जोर जोर से आवाज लगाने लगे
अरे वो चिंटू की मइया, सुनती हो
हमार छाती में बहते दर्द है, हम से बर्दाश्त नहीं होत है
चिंटू को बुलाओ, डॉक्टर साहब के पास अबही ले चलो
अइसन लगता है कि जान निकल जाई
चिंटू का हुआ बाबू जी
बाबूजी तब तक बेहोश हो गए
विभा पानी गर्म कर के लाई, बाबूजी गर्म पानी पी लीजिए आराम हो जाएगा।
बाहर में अंधी तूफान जोर पर था ऊपर से रात के 2 बज रहे थे।
चिंटू फोन उठाकर डॉक्टर को फोन लगता है
डॉक्टर अंसारी , आवाज आता है जिस नम्बर को आप फोन लगा रहे है वो पहुंच के बाहर है।
The number u r dailing is not reachable, dial after sometime.
राधा देवी पैर में जोर जोर से तेल मालिस करने लगी
घर में अफरा तफरी मच गया। जब तक डॉक्टर पहुँचा, सुबह हो गई।
घर में आस पास के लोग जमा हो गए।
वासुदेव बाबू स्वर्ग सिधार चुके थे। घर में मातम का माहौल छा गया । जितनी मुंह उतनी बातें
कई लोग कहते अगर समय पर डॉक्टर बाबू आ जाते तो वासुदेव भैया
अवश्य बच जाते । पैसठ वर्ष के ही तो थे, ये भी कोई उम्र है जाने की।
वासुदेव जी बड़े खुशमिजाज किस्म के थे आस पास के गांव के लोग से उनकी खूब बनती थी। सभी लोग उनकी मौत से दुःखी थे।
राधा देवी शौकीन मिजाज की थी। लाल रंग से उनको बहुत प्यार था। पति के मौत के बाद किसी को हिम्मत नही हो रही थी कोई उनके पास सफेद साड़ी लेकर जाए। यह काम उनकी छोटी ननद शोभा को दिया गया, जिसको राधा अपनी बेटी जैसा प्यार करती थी।
शोभा डरते डरते गई सफेद कपड़े लेकर
भौजी ई ल
आज से ई हे
राधा का.......
ई सफेद साड़ी हमरा के
ना हमारा से ना होई
सफेद साड़ी राधा उठा कर फेंक देती है।
किसी की हिम्मत नहीं होती कि उनको जा कर बोले कि सफेद साड़ी पहने।
राधा चिल्ला- चिल्ला कर कह रही थी
हमार पति के मौत हुई है
हमार मन के ना
हम विधवा हुए है, हमार मन आज भी
सुंदर चीज को पसंद करत है।
हम से सफेद कपडा धारण ना होई।
ई समाज आपन रस्म हमारा पर मत थोपो, हम विधवा भइनी, हमार मन ना।
ये सब सुनकर सभी की छाती फट जाती हाय रे समाज, हाय रे रीति रिवाज।
सभी की आंखे छलक जाती। खुले दिल वाली राधा आगे कहती
जब दो लोग एक साथ जन्म नहीं लेते
तो एक साथ मरेंगे कैसे?
राधा के जहन में तमाम सवाल थे जो समाज के मुंह पर चाटा थे। जिनका उत्तर किसी के पास नहीं था।
बाद में पुरोहित जी के बहुत मनाने पर वह सफेद कपड़े पहनी लेकिन संतुष्ट नहीं थी।
समय का काम है चलते जाना कभी रुकता नहीं है। पांच वर्ष के बाद राधा देवी की पोती मुस्कान की शादी ठीक हुई जो पेशे से इंजीनियर थी और उसका होने वाला पति भी इंजीनियर था। घर में खूब शॉपिंग हो रही थी। किसी दिन गहने की तो किसी दिन कपड़े की। सभी के लिए कपड़े खरीदें
गए । राधा देवी के लिए भी सूती की हल्के रंग की साड़ी जो उनको बिल्कुल न भाई। लेकिन उतने सारे लोगों में कुछ कह न पाई।
चपल जो उनके लिए खरीदें गए थे वो फूटे आंख न सुहाए। बेचारी मन को कितना संभाले बाकी लोगों के रंग विरंगे कपड़े गहने देखकर राधा का मन विचलित हो रहा था।
शादी के दिन तो गजब हो गया । सभी के लाल पीले चमकीले लिबास में देखकर राधा ने भी अपनी एक पहले वाली लाल साड़ी पहन ली लेकिन वह साड़ी बहुत पुरानी होने की वजह से राधा के मन को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। शाम हो होने लगी देखते ही देखते सारे हित रिश्तेदार पहुंच गए । राधा के भाई और भतीजे तथा साथ में भाभी भी आई।
अपनी माता तुल्य भाभी को देखकर राधा अपना दुःख बर्दास्त न कर पाई। अपनी भाभी के गले लग कर जोर जोर से रोने लगी।
सिसक -सिसक कर कह रही थी
भउजी हो हमरा के दोसर, चमकीला, साड़ी किन द
हम ई न पहनब, भइया से किनवा द।
उनके भैया महेश जी उसी समय चटक लाल रंग की साड़ी खरीद कर ले आए और राधा पहन कर शादी का लुत्फ़ उठाई, उसका मन हल्का हो चुका था।
अर्चि