बड़े सुहाने जीवन के दिन....
जब
बहाते हैं दिन रात पसीना लहू संग,
पुरूष मेहनत कर जीते कशमकश
संग ।
वेदना को दिल में ही छुपाते जीते
मुस्कुराहट के संग ।
फँस जाते रिश्तों के भँवर में पत्नी
तो कभी माँ के संग,।
मीठी बोली बोल माता-पिता कभी
भाई-बहन ,सब परिवार संग।
सबको सफ़ल बनाने में टूटते बिखरते
कभी न छोड़ते धैर्य का संग..।
माँ का लाड़ला बेटा, बहन का प्यारा
भी पत्नी का निभाते कर्तब्य हरदम ।
खुद जिम्मेदारियों के बोझ से
थककर भी,
हर पथ पर ये सबकी रक्षा करते हैं ।
कभी बच्चों के मुख से प्यारे पापा
सुन,
खुद को सफल समझ लेते हैं ख़ुश
हो लेते हैं।
देने को उनका भविष्य उज्जवल,
कड़ी कितनी मेहनत करते हैं ।
बच्चों को ऊंचा उठाने को,खुद
नीचे ही झुक जाते हैं।
घर चलाने की जुगत में,आधी नींद
ही सोते हैं।
ये आँखों से तो कम ही मगर,दिल
से नम रहते हैं ।
मीठी वाणी से ये बिगड़ा काम बना
लेते हैं
जीवन में कशमकश फ़िर भी ये ख़ुश
रहते हैं मुस्काते हैं....!
सबकुछ छुपा लेते हैं..
जीने के चार दिन...!
क्योंकि बड़े सुहाने हैं जीवन के दिन...!
इन्दु उपाध्याय संचिता