Tuesday, May 11, 2021

मेरे दिवाकर चाचा

दिवाकर चाचा मेरी बड़ी ईया के सबसे बड़े बेटे है। घर वाले उनको प्यार से छोटे बुलाते हैं क्योंकि वे मेरे पापा से छोटे हैं। मेरे बाबा को सभी चाचा कहकर बुलाते थे क्योंकि बड़े बाबा पहले के लोगों में इतनी एकता थी कि घर में एक व्यक्ति को जिस नाम से बड़े पुकारते थे बाकी लोग भी वही बुलाते थे। हमारी दोनों ईया सगी बहने थीं और दोनों बाबा सगे भाई। बड़ी ईया की बड़ी बेटी रामवती बुआ और उनके बाद दिवाकर चाचा। ये दोनों भाई बहन मेरे बाबा को चाचा कहकर बुलाये तो बाकी सदस्यों ने भी चाचा कहना शुरू कर दिया। बड़े दादा जी को सब लोग बबुआ जी बुलाते थे। 
जब से मैंने होश संभाला तभी से देख रही हूँ। दिवाकर चाचा को एक कर्मठ इंसान के रूप में। जब सब लोग सो रहे होते तो सबसे पहले वही उठते थे। मवेशियों को खिला-पिलाकर, खेती-बाड़ी के सारे काम बड़ी जल्दीबाजी से कर लेते थे। अपने चारो बच्चों का भी ख्याल खूब रखते थे। जहाँ  गाँव के बाकी बच्चे पैदल स्कूल जाते थे वहीं वे अपने बच्चों को विद्यालय खुद ही बारी-बारी से पहुँचाने और ले आने जाते थे। 
दिवाकर चाचा हर काम को पूरी श्रद्धा और लगन से करते थे । चाहे वो खेती का काम हो, मवेशियों का काम, घरवालों का काम हो, गाँव वालों का काम हो या रिश्तेदारों का। हर काम को बड़े आनन्द और उत्साह के साथ मैंने उनको करते देखा है। जब मैं छोटी थी तब उनकी सिर्फ मेहरौना में दुकान थी। अब तो कई दुकानें हैं। खेती-बाड़ी से सम्बंधित जो कुछ भी उनकी दुकान में वस्तुएँ रहती जैसे खाद, बीज या कीटनाशक वे आस-पास के गाँव के लोगों की भरसक मदद करते। बहुत बार उधार भी दे देते थे। जब लोगों के पास पैसे होते तो उनका कर्ज देते थे। हमारे गाँव के लोग उनको काफी इज्जत और सम्मान देते हैं। वे लोगों की भरसक सहायता करते थे। 
हमारे गाँव मनिकपुर की कई बेटियाँ या रिश्तेदार बस से उतरते और उनको गाँव तक आने के लिए कोई सवारी नहीं मिलती तो वे खुद ही छोड़ जाते थे। सबकी मदद करते थे।
मुझे याद है कि गर्मी के दिनों में जब सब लोग गर्मी के आतंक से घरों में छुपे रहते थे तब भी वे दोपहर को खाना खाने आते थे, खाना खाकर जरा आराम भी नहीं करते। फिर वे चिलचिलाती धूप में वापस दुकान पर चले जाते थे। कोई पर्व या त्योहार हो, अपने परिवार का खास ध्यान रखते । उनकी हर माँग पूरी करते। वे अपने घरवालों का ध्यान रखते हुए, गाँव तथा रिश्तेदारों का भी भरपूर ध्यान रखते।
जब कोई इंसान अपने परिवार का बहुत अच्छे से देखभाल कर रहा होता है, उनको अच्छे संस्कार दे रहा होता है, अपने माता-पिता को संतुष्ट कर रहा होता है तो निश्चित रूप से एक सुंदर और सुखद राष्ट्र का निर्माण कर रहा होता है। अपनी हर जिम्मेदारियों को खुशी से निभाना बहुत बड़ी पूजा है। अपने रिश्तेदारों का ध्यान रखना उनके हर दुख-सुख में खड़े रहना निश्चित रूप से किसी भी तीर्थ से बड़ा है। हर मनुष्य का यह परम् कर्तव्य है कि अपने परिवार और रिश्तेदारों का ध्यान रखकर, उनकी मदद करके सुंदर और सुखद राष्ट्र के निर्माण में अहम भूमिका निभाए। क्योंकि हर व्यक्ति के निर्माण से ही एक सुंदर और खुशहाल राष्ट्र का निर्माण संभव है।  दिवाकर चाचा मेरे रोल मॉडल हैं। उनका जीवन हम सभी को मेहनत करके आगे बढ़ने का पैगाम देता है।  आप ने सिर्फ शरीर का त्याग किया हैं। आपके विचार आज भी समाज के लिए आईना हैं। आपने जो अपने समाज के लिए किया हैं वह सभी को नेक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।  हमारी चाची मंजू अर्थात चाचा की धर्मपत्नी चाचा के कर्मठता  की काफी कद्र करती थी।  मंजू चाची उनका जैसे दाहिना बाह थी। दोनों की गृहस्थी बेहद खुशहाल थी। उनकी बड़ी बेटी का नाम रोज़ी है। चाचा, चाची को रोज़ी की मम्मी तथा चाची चाचा को रोज़ी के पापा कहकर बुलाते थे। 2005 में जब मेरी शादी हुई थी। तब चचा ने मेरे लिए विदाई की बनारसी साड़ी खरीदी थी। वो मैरून बनारसी साड़ी जिसे मैं पहनकर अपने ससुराल आई थी। चाचा की याद बरबस दिलाते रहेगी। हर सुबह दिनभर कड़ी मेहनत करने के लिए आपका कभी हार नहीं मानने वाला व्यक्तित्व प्रेरित करता रहेगा। उनका यूँ अचानक चले जाना हम सब का व्यक्तिगत नुकसान न होकर सामाजिक नुकसान है। 

चाचा तुम्हारा यूँ चले जाना
बहुत खलता है
अरे ओ जिम्मेदार चाचा!
अरे वो दिवाकर चाचा!
क्यों भूल गए कुछ भी बताना!
थोड़ा दिन और रह लेते
समाज और रिश्तेदारों की सेवा
और कर लेते!

भुलाए भी तुम नहीं भूलते
आँखों में तुम्हारा चेहरा झलकता है
तुम्हारी यादें है खुश्बू सी
दिल को सुगन्धित करती हैं।

हे ईश्वर तुमसे निवेदन है
मेरे चाचा को जन्नत तुम देना
चाचा सबके दुलारे है
बहुत सारा प्यार तुम देना।

हम चलेंगे चाचा के बताए हुए रास्ते पर
मेरी चाची को हिम्मत तुम देना
चाची को रखेंगे बड़े हिफाजत से
हे खुदा तुम चाचा को जन्नत में जगह देना।


*डॉ. अर्चना पांडेय अर्चि*

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