*भगवान हर जगह है*
बात उस समय की है जब मैं तिनसुकिया कॉलेज में पढ़ रही थी। स्नातक का दूसरा वर्ष था। हम सभी पिकनिक मनाने अरुणाचल प्रदेश गए। दिसंबर का महीना था। हमारे साथ में कई शिक्षक, होस्टल के वार्डन तथा होस्टल में खाना बनाने वाली दीदी लोग भी थीं। हम सभी सुबह के छः बजे निकले रास्ते में खूब मौज -मस्ती हुई । बिहू का गीत रास्ते भर बजा और हम सभी ने जम कर आनंद उठाया। हमारी रांद्धनी बाइदेउ (खाना बनाने वाली दीदी) ने भी खूब नृत्य किया। बहुत सुंदर और सुखमय परिवेश बना हुआ था। हम सभी अत्यधिक आनन्दित थें। जिस नदी के पास हमें पिकनिक मनाना था उस पर लकड़ी का पुल था। पुल की हालत ठीक नहीं थी, बहुत जर्जर हालत में था। ड्राइवर ने बस से पुल पार करना मुनासिब न समझा और हम सभी को नदी के इस पार ही बस से उतर जाने के लिए कहा। हम सभी उतर गए। दिन भर घूमे -फिरे। 3 बजे हम सभी को वापस आने के लिए कहा गया था। इसलिए मैं और मेरे साथ मेरी और एक दोस्त सुनीता ठाकुर दोनों सबसे पहले बस की ओर नदी के उस पार जाने लगे। हम दोनों सहेलियाँ आपस में बात करते हुए पुल पर चल रही थें। तभी मेरा बया पैर धँसने लगा और मैं तकरीबन आधा लटक गई। मेरी दोस्त सुनीता जोर-जोर से चिल्ला रही थी, बचाओ......बचाओ और मैं पुल की लकड़ी पकड़ कर लटकी हुई थी। पर मुझे अटूट विश्वास था कि मैं तो बचूँगी ही। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। फिर भी मैने पुल की लकड़ी को अपनी पुरी शक्ति के साथ पकड़ रखा था। तभी पीछे से भगवान स्वरूप एक व्यक्ति आ गया और उसने मुझे सुरक्षित निकाल लिया। मेरे बाए पैर का चप्पल पानी में बह गया । मैंने चैन की स्वांस ली। भगवान हमारे आस -पास ही घूमते है इंसान के रूप में । हम सभी को इंसानों में छुपे भगवान की कद्र करनी चाहिए। और हर समय हम परमपिता परमेश्वर की हिफाज़त में है इसका ध्यान रखना चाहिए। आज भी यह घटना जब मुझे याद आती है तब मैं काँप उठती हूँ और विश्वास से कहती हूँ, हाँ भगवान है न हमारे चारों तरफ मनुष्य के रूप में
*अर्चि*