Thursday, April 22, 2021

सेठ का बेटा



रघुवीर पांडेय अपने इलाके के बहुत बड़े व्यपारी है। उनके घर में लक्ष्मी जी का वास है। हर तरह से सम्पन्न रघुवीर  
की ज़िंदगी खुशियों से भरी हुई है। कहीं से भी कोई अभाव नहीं दिखता। खेती-बाड़ी भी खूब हैं। हर तरह के अनाज और सब्जियाँ हर मौसम में उनके खेत में लगी रहती हैं। हर तरह के फल से भी उनका बगीचा सुसज्जित रहता है। शायद ही कोई फल हो जो उनके बगीचे में न हो। वे खुद तो इन तमाम वस्तुओं का आनंद उठाते साथ में अपने रिश्तेदारों को भी समय-समय पर देते रहते। कई
बार तो वे लोग आकर लेकर जाते और कई बार रघुवीर पांडेय खुद उन्हें देने तक चले जाते। घर में बहुत सारे नोकर - चाकर, एकदम राजा के राज्य जैसी ख़ुशियाँ हर तरफ बिखरी रहती हैं। सब कुछ होने के बावजूद भी एक ऐसी बात थी जो उनके मन में कचोटती रहती। उनका व्यापार छोटे से शहर में था। ऐसे तो उस शहर में बहुत सारी इंग्लिश मीडियम की स्कूलें थी लेकिन कहीं भी इतने अच्छे से अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती कि रघुवीर जी के बच्चे अंग्रेजी में बात कर सकें। लेकिन रघुवीर जी का यह बहुत बड़ा शौक था कि उनके बच्चे भी अंग्रेजी में गुटर गु कर के स्मार्ट बन जाए, बिल्कुल शहरों के बच्चों के जैसे। रघुवीर पांडेय और उनकी धर्मपत्नी हीरा देवी अक्सर इस बात को लेकर दुखी होते रहते। 

अक्सर गर्मियों की छुट्टी में उनकी बड़ी दीदी और उनके बच्चे अवश्य उनके घर आते। बड़ी दीदी के दो बेटे- लक्की और प्रिंस। दोनों आपस में अंग्रेजी में कई बार बात कर लेते। उन बच्चों को अंग्रेजी में बात करते देखकर हीरा देवी और रघुवीर पांडेय दोनों बच्चों को खूब स्मार्ट समझते।

हीरा देवी - अजी सुनते हो, हमरा भी मन कर रहा है कि हमारे बच्चे भी अंग्रेजी में बतियाएं। हाँ-हाँ ज़रूर काहे नाहीं, हमारे दोनों बच्चे भी अंग्रेज़ी में बतियाएँगे।
रुको हम आइडिया खोजते हैं। रघुवीर जी ने कहा।
जब आप आइडिया खोज रहे हैं तो आइडिया कितने देर तक नहीं मिलेगी, उसको मिलना ही होगा- हीरा देवी ने उम्मीद भरी आँखों से कहा।
अब दोनों प्राणी मिलकर आइडिया ढूँढने लगे।

इस बार गर्मी में भी बड़ी दीदी रेखा अपने दोनों बच्चों के साथ रघुवीर जी के घर पधारी। बच्चों को अंगेज़ी बोलते हुए देखकर रघुवीर जी और उनकी धर्म पत्नी अपने बच्चों के बारे में सोचने लगते।
एक सुबह हीरा देवी ने रघुवीर जी से कहा
अजी हमने आइडिया निकाल लिया है। अब हमारे बच्चे भी अंग्रेजी बोलेंगे।
रघुवीर जी की आँखे चमक उठी।
बताओ, बताओ जल्दी बताओ.....
ये तो बड़ी खुशी की बात है।
हमारे बच्चे अंग्रेजी में.....
भगवान सबकी सुनता है...
हमारा भी.....

हीरा देवी की आइडिया से उनके पति सहमत हो गए। आइडिया यह थी कि वे अपने तीन बच्चे आराध्या, रोशन और छोटू तीनों में से किसी एक को उनकी बड़ी दीदी रेखा के साथ शहर में भेज देंगे। जहाँ पर अच्छी अंग्रेजी की पढ़ाई होती है। अब यह तय करना बड़ा मुश्किल हो गया था कि तीन बच्चों में किसको भेजा जाए। आराध्या जो बड़ी बेटी है, घर का सारा काम देख लेती है। उसके जाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। छोटू तो छोटा ही है। रोशन का जाना तय हो गया। रोशन ही जायेगा बुआ रेखा के साथ शहर में और फर्राटेदार अंग्रेजी बोलेगा।
अब जाने की तैयारी होने लगी। रोशन जाना नहीं चाहता था लेकिन, अपने मम्मी - पापा की ख्वाहिश पूरी करने के लिए उसको जाना ही पड़ा। 

रोशन एक नए सफ़र पर निकल चुका था जहाँ पर सब कुछ नया था। जहाँ उसका कोई पसंदीदा व्यक्ति नहीं था। उसकी दादी और उसके प्यारे दोस्तों की याद उसको सबसे ज़्यादा आती थी। उसके फूफा जी स्टेट बैंक के मैनेजर थे। बुआ के घर में हर वस्तुएँ थी। कोई भी चीज़ की कोई कमी नहीं। पर अपनानपन दूर -दूर तक नहीं था। बुआ के दोनों बेटे लक्की और प्रिंस, जैसे दो पुतले हो। हर काम समय पर होता। समय पर नहाना, समय पर पढ़ना,  समय पर स्कूल जाना, समय पर ट्यूशन पढ़ना तथा समय पर सो जाना। हर समान अपने जगह पर रहता। थोड़ा भी इधर -उधर नहीं। रोशन का एडमिशन विवेकानंद केंद्र विद्यालय में करा दिया गया। पर रोशन को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। वे उसके स्कूल और मोहल्लें के दोस्तों को याद करके रो पड़ता। स्कूल में भी वह गुम-सुम सा रहता। गर्मी के दिनों में जब रात को छत पर सोता तो रात-रात भर तारें गिनते रह जाता, नींद नहीं आती। अंग्रेजी सीखने के लिए घर छोड़ने वाला रोशन पूरी दुनियादारी  सीख रहा था। सीख रहा था रिश्तेदारों का झूठा प्रेम जो सिर्फ दिखावा है। उसकी बुआ उससे छोटा- मोटा हर काम करवाती थी। स्कूल के बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे। लेकिन उसको तो अंग्रेजी सीखनी थी। 
एक बरसात की रात जब सब लोग खाना खा रहे थे तब उसकी बुआ ने सबको सलाद दिया लेकिन रोशन को नहीं। जब रोशन के फूफा जी ने रोशन को सलाद नहीं दिए जाने का कारण पूछा तो बुआ ने झट कह दिया -
रोशन को तो शर्दी है। 
दस वर्ष का बच्चा रोशन, अपनी बुआ की इस करतूत पर अवाक रह गया।
पर कुछ न बोला।
उसकी माँ और दादी उसकी बड़ी बुआ रेखा को कितना प्यार और सम्मान देती हैं। जब वह अपने बच्चों के साथ उसके घर जाती हैं तो उनकी सेवा में कुछ भी कमी नहीं रहती। और उसके फूफा जी तो पहुना कह कर बुलाए जाते। फूफा जी की इतनी आवभगत होती जैसे भगवान हो। 

एक दिन रोशन की मम्मी का फोन आया, रोशन के मुँह से तो दो शब्द भी नहीं निकला। बस आँखों से आँसू बहते रहे। 
उसकी बुआ ने रोशन के हाथ से फोन लेते हुए कहा
भाभी असल बात ये है न, रोशन नया-नया अंग्रेजी बोलने को सीख रहा है। इसलिए वह शर्मा रहा है। बाद में वह आप से बात करेगा।

इस घटना के बाद रोशन के पिता को कुछ अच्छा महसूस नहीं हो रहा था। वे दूसरे दिन ही अपने बेटे से मिलने के लिए निकल पड़े। रास्ता जैसे बहुत लंबा हो गया हो। आख़िर अपने दीदी के घर पहुँच गए। दो घण्टे के बाद जब उनका बेटा स्कूल से घर आया तो बेटे की हालत देखकर वे निःशब्द रह गए। इतना मोटा -तगड़ा रोशन सुख सा गया था। उसका मुस्कराता चेहरा सुख सा गया था। अपने पापा की गोद में सिर रख जी भरकर रोया। 

रघुवीर जी को सब समझ आ गया था। बेटे को अंग्रेजी सिखाने का भूत उतर चुका था। 

रोशन घर पहुँच कर एक बार फिर हँसने खिलखिलाने लगा। उसके दोस्तों में खुशी की लहर दौड़ गई। दादी के जिगर का टुकड़ा दादी को फिर मिल गया था। 

दुकान पर अन्य लोग रोशन को देखकर बोले
सेठ का बेटा सेठ ही बनेगा न।
अंग्रेजी सीखकर अंग्रेज भला क्यों बनना।

*-डॉ. अर्चना, पांडेय अर्चि*
*तिनसुकिया,असम*

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